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साधु-संतों पर भविष्य निर्धारण की जिम्मेदारी!

Posted On: 8 Dec, 2011 Others में

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शिवेष सिंह राना
अपने कर्तव्यों का पालन ही धर्म हैै। व्यक्ति को कर्म करते रहना चाहिए और फल की इच्छा त्याग देनी चाहिए, आदि धर्मार्थपूर्ण बातों को प्रचारित-प्रसारित करने वाले साधु-संतो पर देश के धार्मिक भविष्य निर्धारण की जिम्मेदारी है।
यह एक वास्तविक सत्य है कि सत्संग में जुटने वाली भीड़ किराए की नहीं होती। सत्संग में जाने वाले लोग खुद की कमजोरियों को पहचानकर उसे ईश्वर भक्ति के माध्यम से दूर करने का प्रयास करते हैं। सत्संग में मिलने वाला ज्ञान रूपी प्रसाद न केवल व्यक्ति को कर्तव्य परायणता सिखाता है, बल्कि समाज में व्याप्त कुरीतियों का मुंहतोड़ जवाब देने की प्रबलइच्छा शक्ति को जन्म देता है।
लोग ज्ञानोत्थान के लिए विभिन्न संत-महात्माओं की अमरवाणी को जीवन में उतार कर जीवन सफल व सुखमय बनाने की कवायद में जुटे रहते हैं, क्योंकि अलग-अलग गुरुओं का ज्ञान बांटने का तरीका चाहे जो हो लेकिन उद्देश्य एक ही होता हैै- लोगों को सही व उपर्युक्त रास्ता बताना। जिससे ‘सत्संगी’ मनुष्य योनि में मिला जीवन कृतार्थ कर सकें।
सत्संग में बताया जाता है सत्य ही जीवन का आधार है। सच्चाई, ईमानदारी व अनुशासन ही व्यक्ति को महान बनाते हैं। उदाहरण के तौर पर समाज में रहने वाले उच्च पदस्थ या अकूत सम्पत्ति के मालिकों को लोग जब-तब ही याद करते हैं या फिर अपनी आंतरिक ईष्र्या को दर्शाते हुए ऐसे व्यक्तियों की बुराई करते देखे जाते हैं।
जबकि एक सच्चे व ईमानदार व्यक्ति की तारीफ ही सुनने को मिलती है। भले ही लोग यह कहते हुए नजर आएं कि क्या मिला ईमानदारी का नतीजा? चाहता तो आज ये कर लेता…..वो बन जाता……इन बातों मेें भी सच्चाई की बुराई पर जीत समझ आती है।
‘‘यह तो एक नेक इंसान ही जान सकता है कि उसकी सच्चाई, ईमानदारी व अनुशासित जीवनशैली ने उसे अन्र्तद्वन्द से लड़ने में उसकी कितनी सहायता की है’’।
अक्सर देखा गया है कि सत्संग के अमृतपान से लोग खुद को तृप्त कर ओजस्वी जीवनयापन के सपने तो बुनते हैं, लेकिन सपनों का साकार होना बेहद कठिन है। लोग कुछ ही दिनों में सत्संग में प्राप्त ज्ञान को जानबूझकर अनदेेखा करते हैं, क्योंकि वे ओजपूर्ण जीवन की कल्पना तो करते हैं लेकिन उसे जीवन में उतार नहीं पाते। जरुरत है नियमित प्रवचन सुनने की, क्योंकि कलयुग में विकारों की उत्पत्ति साकार मनोवृत्ति से कहीं ज्यादा है।
धर्म गुरुओं का कहना है सत्संगी व्यक्ति ईश्वर प्राप्ति के बेहद करीब होता है, क्यों न हम सब दुनिया की झंझावतों को छोड़ आध्यात्म की ओर रुख करें।

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4 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

shashibhushan1959 के द्वारा
December 10, 2011

मान्यवर शिवेश जी, जो सत्य का संग नहीं छोड़ता, वही सत्संगी है. बाकी तो ढोंग है. अच्छी रचना.

abodhbaalak के द्वारा
December 9, 2011

शिवेश जी अच्चा प्रयास, आज साधू संतो के रूप में कैसे कैसे बहरूपिये सामने आ रहे हैं ये आप देख ही रहे हैं…. http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

rahulpriyadarshi के द्वारा
December 9, 2011

अध्यात्म मानव को सबसे सुदृढ़ संबल प्रदान करता है,मेरी समझ से अगर किसी को सत्संग से चिढ है तब भी वो उन सिद्धांतों का स्वैच्छिक अनुपालन करे तो बहुत हद तक दुनिया के झंझावातों के बीच भी मार्ग निकल सकता है.सत्य परेशां हो सकता है,पराजित नहीं…आपके लेख की मैं प्रशंसा करता हूँ,एवं आशावादी दृष्टिकोण का स्वागत करता हूँ.

nishamittal के द्वारा
December 8, 2011

साधू संत सदा आदरनीय रहे हैं परन्तु वर्तमान में साधू असाधु के रूप में अधिक मिलते हैं.यही कारण है कि अंतर करना कठिन हो जाता है.


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