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दिल्ली दर्शन

Posted On: 30 Jun, 2012 Others में

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शिवेष सिंह राना
बात कानपुर से दिल्ली के सफर की है। मुझे इंटर्नशिप के लिए दैनिक जागरण नोएडा भेजा गया था। अपनी याददाश्त को ताजा करता हूं तो पाया की अपने बाल्यकाल से निकल युवावस्था में पहली बार अपने घर वालों से अलग हो रहा था। खैर जेहन में कई आशंकाएं समेटे मैं दिल्ली को रवाना हुआ। बताते चलें के मेरा प्रिय मित्र राहुल और छोटे भाई के समान मनीष मुझे स्टेशन छोडने आये थे।
जब सीट मिली
मेरा रिजर्वेशन था दिल्ली के लिए। जब ट्रेन सेंट्रल पर रुकी तो देखा कि खचाखच भरी ट्रेन में मेरी सीट पर पहले से कोई कब्जा जमाये था। बताया कि ये मेरी सीट है तो मन ही मन गाली देते हुए बोला आप बैठ जाइये मैं भी बैठ जाता हूं।
कैसे कटा रास्ता
इसे बदकिस्मती कहूं या खुशकिस्मती समझ में नहीं आ रहा दो बहने ठीक मेरे बगल में बैठी थीं। रास्ते भर दोनों मुहांचाही, ढिसुम-ढिसुम करती रहीं। डर सता रहा था कि तीन सीटर सीट में वैसे भी चार जमे हैं, कहीं धोखे से शारीरिक स्पर्श हो गया तो कौन बचाएगा इनकी मार धाड से, और तो और कई हाथ साफ कर ही डालेंगे। यह सोच किसी तरह एकदम भोला बच्चा बन बैठा रहा। प्रदेश की सरकार के मुखिया का इलाका आते-आते ट्रेन की दशा भूसा गाडी में भरे माल से बदतर हो गई थी, ये कहें तो गलत न होगा। एक भाभी स्वरूपा देवी जी भी अब हमारी सीट में जगह घेरे हुए थीं।
जब पहुंचा दिल्ली
नया शहर अलग-थलग लिबास से सजे लोग अनायास ही मुझे अपनी ओर आकर्षित कर रहे थे। मैं अपने जाने का रास्ता पूछ ही रहा था कि सामने से आई युवती ने अपना चश्मा बिखरे बालों से सटाते हुए मुझसे कहा कि क्या आप मुझे मेट्रो स्टेशन जाने का रास्ता बता सकते हैं, भला एक अनजान दूसरे को रास्ता क्या बताएगा ? मैने माफ कीजिएगा कहकर पल्ला झाड लिया।
मेट्रो की पहली सवारी
मेट्रो का टोकन लेकर मैं ट्रेन के इन्तजार में खडा हो गया। आशंकाए प्रस्फुटित हो रही थीं पता नहीं क्या सिस्टम है मेट्रो का? बहरहाल अब मेट्रो आ चुकी थी। गेट से घुसते ही मैने पाया कि एक बाउंसर स्टाइल में खडा लडका सामने था मेरे। उससे इफ्को चैक जाएगी पूंछ उसकी हां में सवार हो गया था मै । एक अख्खड कनपुरिये के लिए यह एक नया अनुभव था। एसी चल रही थी, महिलायें आरक्षित सीट के लिए पुरूषों को उठाने में लगीं थी। ढेर सारे मेकअप और बेढंगे कपडे पहने लडकियां अपनी बातों में व्यस्त थीं। काई अपने पुरूष मित्र के साथ मशगूल था वहीं पास में खडा एक अफ्रीकन मेरे आकर्षण का केंद्र बना हुआ था।
जब पहुंचा अखबार के आफिस
मैं जिस अखबार के आफिस की बात कर रहा हूं वह नोएडा सेक्टर ६३ में है। उसके पास में ही श्री एस7 का आफिस है। गेट पर परिचय देकर मैं और मेरा दोस्त प्रशांत अन्दर गए। मालूम हो कि वह एक दिन पहले ही यहां आ गया था। सुन्दर से दिखने वाले आकर्षक आफिस से अनायास ही दिल जुड गया था। जिसे टूटने में स्थानीय सम्पादक जी श्री किशोर झा साहब से मिलने भर की देरी थी। उनसे मिलने पर उन्होंने वहां मौजूद श्री कविलाश मिश्र जी से मिलवाया। उनका कहना था कि ये हैं रिपार्टिंग हेड आईटीओ कार्यालय के। अब उन्होंने हम लोगों को इस कार्यालय का पता लिख दिया और जाने का रास्ता भी बता दिया।
new_delhi तुरन्त जाओ जंतर-मंतर
आईटीओ कार्यालय में पसीना सुखा ही रहे थे कि जन्तर मंतर जाने का आदेश हो गया। वहां कोई प्रदर्शन चल रहा था। अनजान शहर और नई जगह को जान भी न पाए थे और वहां कैसे जाएंगे सोच कर मन और अशांत हो उठा। हमारे पास ना रोड मैप था ना ही कोई अपना जो रास्तों से रूबरू करा सके। शुरुआती चार-पांच दिनो कभी सफदरगंज अस्पताल तो कभी शहर से सुदूर सोनिया विहार, संगम विहार तक का रास्ता तय किया। गौरतलब है कि गाडी न लाए हम लोग इन दिनों 15 किलोमीटर रोजाना पैदल चले हों तो कोई बडी बात नहीं। कई दिनों परेशान होने के बाद जब मैने एक महानुभाव से अपनी समस्या बताई तो वो मुझसे खीजते हुए बोले भाग्यशाली हो कि दिल्ली में इंटर्नशिप मिली है लोग नाक रगडते हैं और वहां नहीं मिल पाती इंटर्नशिप । फोकट में मिली है तो कहां समझोगे इसकी अहमियत।
सेलेब्रिटीज से मिलने का सुख
संतो के गंगा बचाओ आंदोलन की रिपार्टिंग के समय कई असाधारण साधु-संतों के दर्शन तो हुए ही, बचपन के सुपरहीरो शक्तिमान यानि मुकेश खन्ना से मुलाकात हुई। बाद में एक दिन कुतुबमीनार रिपोर्टिंग के लिए गए वहां स्वच्छ इण्डिया कैम्पेन के दौरान खामोश ……….डायलाग कहने वाले और दिल में राज करने वाले शत्रुघ्न सिन्हा और फार्मूला वन के रेसर नारायण कार्तिकेयन समेत कई नेताओं से भेंट हुई ।
आफिस स्टाफ की दरियादिली
शुरुआती एक-दो दिन को छोडकर सभी पत्रकारों के व्यवहार ने हमारा दिल जीत लिया। पहले दिन हमलोग जहां बैठे उसके ठीक बगल में हमारे नोएडा के संस्थान से पढी एक लेडी रिपोर्टर ने बातचीत कर थोडी नर्वसनेस दूर की। कुछ ही दिनों में सभी घुलमिल गए। दिल्ली पत्रकारिता की बात करें तो पत्रकारों का गैरघमण्डी व्यवहार खुद को और उनसे दिल से जुड जाने पर विवश करता है। पूरी दिल्ली का क्राइम देखने वाले प्रदीप सर हम लागों से हाथ मिलाते हैं, रेलवे बीट के पत्रकार धनन्जय करियर संबंधी टिप्स देते हुए डिप्रेशन में ना जाने की बात करते हैं। वहीं अपनी कडी लगन व मेहनत के दम पर पत्रकारिता में धाक जमाए कोर्ट बीट के पवन कुमार न थकने न रुकने का हौसला देतेे हैं। आफिस के सेकेण्ड माने जाने वाले वीके सर अपनत्व की भावना से ओतप्रोत देखे जा सकते हैं। सच कहूं ता ये सब मैने और कहीं के पत्रकारों में ना देखा है और ना सुना है।
सुनहरी यादें
वैसे तो बहुत कुछ यहां अजीब सा लगा लेकिन एक मजेदार किस्सा बयां करता हूं। हम अपनी लक्ष्मीनगर स्थित पीजी से प्यारेलाल भवन अपने आफिस निकले थे। बस में आगे बैठी एक लडकी फोन में किसी आईएएस और पीसीएस संबंधी बातों का तानाबाना बुनने में जुटी थी। लडकी लीड लगाकर ऐसी व्यस्त हुई कि बातखत्म करने का नाम ही नहीं ले रही थी। बगल में बैठा लडका उसकी तरफ कुछ आशा भरी किरणों के साथ देख रहा था। मन में गलत खयाल के साथ हंसी के फव्वारे छूट रहे थे कि लाइन मार रहा है साला! हांलांकि बाद में पता चला कि दोनो भाई बहन थे और किसी मंत्री जी से मिलने जा रहे थे।
पुलिस वाले की दरियादिली
दिल्ली में पानी की बहुत समस्या है। कई जगह बमुश्किल कई दिनों बाद यहां सप्लाई का पानी लोगों को नसीब होता है। लोग बासी पानी पीकर बीमारियों को न्योता देने को मजबूर हैं। हम संगम विहार इसी खबर को कवर करने गए थे। लौटते वक्त अपने आफिस के लिए बस नहीं मिल रही थी। ऐसे में एक पुलिस वाले ने हमारी समस्या जानकर बिना स्टैंड रास्ते में ही बस रुकवा दी। मालूम हो कि यहां स्टैंड पर ही बसें रुकती हैं।
नौकरी की चिंता
हम लोगों को इंटर्नशिप छंटनी के दौर में मिली थी जहां से नौकरी पाना टेढी खीर से कम नहीं था। आफिस से रूम जाते ही हम और प्रशांत नौकरी पाने की बातों में खो जाते। एक दिन रात करीब 1.30 पर हमने अपने करीबी मित्र जशपाल से बात की। तब कुछ हल्का हुआ मन।
यहां का परिवेष और हम
यहां लोग कानपुर की अपेक्षा कम से कम तीन गुना तेज रफ्तार से चलते हैं। यहां तक कि स्वचालित सीढियों में खडे हो कोई समय बर्बाद करना नहीं चाहता। कोई कुछ भी करे ना कोई रोकने वाला है ना टोकने वाला है। किसी को यदि कोई परेशानी हो तो भगवान ही बचाए उसे। इस मामला में कनपुरिये बाजी मार गए भई………!
अदम गोंडवी जी की कविता की यह चंद पंक्तियां और बात खत्म
जिस्म क्या है रूह तक सब कुछ खुलासा देखिए
आप भी इस दौड में घुस कर तमाशा देखिए
जो बदल सकती है इस पुलिया के मौसम का मिजाज
उस युवा पीढी के चेहरे की हताशा देखिए

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